236वाँ दिव्य नाम, जो
“माँ श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम्” से है, वह है
“ चतुःषष्टि कलामयी”
“THE DIVINE MOTHER WHO BLESSES THE 64 ARTS”
परम्परागत रूप से यह माना जाता है कि चौंसठ अर्थात् 64 कलाएँ हैं। इन्हें सूचीबद्ध करने में मतों में कुछ भिन्नताएँ हैं:-
1. अठारह भाषाओं की लिपियों का ज्ञान,
2. इन लिपियों को लिखना,
3. इन्हें शीघ्रता से पढ़ने और लिखने की क्षमता,
4. चित्रकला,
5. विभिन्न भाषाओं का ज्ञान,
6. पद्य-रचना,
7. सुने हुए को दोहराना,
8. जोखिम उठाना,
9. ऋग्वेद का ज्ञान,
10. यजुर्वेद का ज्ञान,
11. सामवेद का ज्ञान,
12. अथर्वण वेद का ज्ञान,
13. गन्धर्व वेद का ज्ञान,
14. आयुर्वेद का ज्ञान,
15. धनुर्वेद का ज्ञान,
16. अर्थ शास्त्र का ज्ञान,
17. न्यास शास्त्र का ज्ञान,
18. वैशेषिक शास्त्र का ज्ञान,
19. सांख्य शास्त्र का ज्ञान,
20. योग शास्त्र का ज्ञान,
21. मीमांसा शास्त्र का ज्ञान,
22. वेदान्त का ज्ञान,
23. छह वेदांगों का ज्ञान, शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष और कल्प,
24. तन्त्र पुराण का ज्ञान,
25. स्मृति का ज्ञान,
26. काव्य का ज्ञान,
27. अलंकार शास्त्र का ज्ञान,
28. नाट्यकला का ज्ञान,
29. अधर्म के शमन का ज्ञान,
30. नियंत्रण का ज्ञान,
31. आकर्षण का ज्ञान,
32. अधर्म से शत्रुता का ज्ञान,
33. विनाश का ज्ञान,
34. प्राण-मुक्ति का ज्ञान,
35. गति का निरोध करने की कला,
36. जल का निरोध करने की कला,
37. दृष्टि का निरोध करने की कला,
38. “अग्नि” के साथ कार्य करने की कला,
39. शस्त्रों से रक्षा करने की कला,
40. वाणी का निरोध करने की कला,
41. वीर्य-निग्रह की कला,
42. शास्त्र-रचना की कला,
43. हाथियों को प्रशिक्षित करने की कला,
44. घोड़ों को प्रशिक्षित करने की कला,
45. रथों के प्रशिक्षण की कला,
46. मनुष्यों को प्रशिक्षित करने की कला,
47. शारीरिक लक्षणों से भविष्य-ज्ञान (सामुद्रिक),
48. युद्ध-कलाएँ,
49. पाक-कला,
50. विष निवारण की कला,
51. तार वाद्य बजाने की कला,
52. वायु वाद्य (जैसे बाँसुरी) बजाने की कला,
53. ताल वाद्य बजाने की कला,
54. भारी कांस्य वाद्य बजाने की कला,
55. माया रचने की कला (इन्द्रजाल),
56. नृत्य कला,
57. गायन कला,
58. रसायन-विद्या की कला,
59. रत्नों की परख का ज्ञान,
60. चौर्य कला,
61. नाड़ी का ज्ञान,
62. अन्तर्धान होने की कला।
63.नाड़ी का ज्ञान
64.तन्त्र की कला।*सौन्दर्यलहरी में उल्लेख है कि 64 तन्त्र हैं।

