ध्वनि के निर्माण की चार अवस्थाएँ हैं:
1) परा (लोकोत्तर, मानव विचार से परे)
2) पश्यन्ती (दर्शन, मन में प्रकट)
3) मध्यमा (मानसिक, सूक्ष्म वाणी)
4) वैखरी (उच्चरित, श्रव्य वाणी)
ये चारों अवस्थाएँ माँ श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् में माँ के दिव्य नाम हैं। “वैखरी” वह रूप है जिसे मनुष्य ध्वनि के रूप में सुनते हैं।
नादरूपा के रूप में, दिव्य माता माँ श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी शब्द ब्रह्म रूप में आशीर्वाद देती हैं, पवित्र मौन से लेकर अक्षरों तक, सबको आशीर्वादित करती हुईं। प्रत्येक मन्त्र, प्रत्येक अक्षर, प्रत्येक पवित्र ध्वनि माँ का दिव्य आशीर्वाद है।
“दिव्य माता माँ श्री ललिता त्रिपुर सुंदरी ही शब्द ब्रह्म हैं, समस्त ध्वनि की प्रदात्री”
